शिक्षाप्रद नाटक PDF | Shikshaprad Natak Hindi PDF

दोस्तों इस आर्टिकल में हम आपको Shikshaprad Natak Hindi PDF देने जा रहे हैं, आप इसे नीचे पूरा पढ़ सकते हैं और फ्री में डाउनलोड भी कर सकते हैं।

 

 

पात्र – राज पुरोहित (कक्षा 10 का छात्र)

 

 

अजीत भाम्बरे (किसान)

 

 

दीपक चौहान (कपड़े का छोटा व्यापारी)

 

 

स्थान – (गांव से लगा हुआ छोटा बाजार, सुबह का समय, अजीत चाय की दुकान पर)

 

 

अजीत (चाय वाले से) – एक चाय देना भाई।

 

 

(दीपक का चाय की दुकान पर आगमन)

 

 

दीपक – नमस्कार! अजीत भाई!

 

 

अजीत (नमस्कार का उत्तर देते हुए) – कैसे हो दीपक, धंधा कैसा चल रहा है?

 

 

दीपक (अजीत से) – सब भगवान की दया है धंधे से खाने कमाने लायक मिल जाता है। अगर हमे थोड़ी और शिक्षा मिल गयी होती तो…..

 

 

अजीत और दीपक दोनों चाय पीते हुए)

 

 

अजीत (दीपक से) – तुम्हारा कहने का मतलब क्या था?

 

 

दीपक (अजीत से) – यही कि हमें और शिक्षा मिली होती तो हमारा धंधा आगे निकल जाता।

 

 

(दीपक और अजीत दोनों गांव की तरफ अपने घर आते है रास्ते में उन्हें राज मिलता है)

 

 

राज – नमस्ते चाचा जी।

 

 

दीपक (राज से) – स्कूल जा रहे हो बेटा?

 

 

राज (अजीत, दीपक से) – हां चाचा जी।

 

 

अजीत (राज से) – मन लगाकर पूरी तल्लीनता से पढ़ाई करना बेटा, नहीं तो हमारी तरह ही रह जाओगे।

 

 

(अजीत और दीपक अपनी बातो पर हंसते है)

 

 

दीपक (अजीत से) – राज बहुत होनहार लड़का है एक दिन यह जरूर बड़ा ऑफिसर बनेगा।

 

 

अजीत (दीपक से) – हम तो ठहरे गंवार आदमी पर इतना हमे भी मालूम है कि शिक्षा से मनुष्य को जीवन जीने का साधन सुलभ होता है।

 

 

(दीपक और अजीत अपने घर आ जाते है दीपक अपनी कपड़े की दुकान पर चला जाता है अजीत अपने खेतो के कार्य में उलझ जाता है)

 

 

(दूसरा भाग)

 

 

(समय बीतने के साथ राज पढ़ाई करते हुए चार्टर्ड अकाउंटेंट सी. ए. बन जाता है)

 

 

(राज अपने गांव आता है)

 

 

राज (अजीत के घर) – नमस्कार चाचा जी मुझे पहचाना आपने।

 

 

अजीत (कमजोर आंखो से) – नहीं बेटा! मैं तुम्हे नहीं पहचान सका पर आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगती है क्या तुम राज पुरोहित तो नहीं हो?

 

 

राज (अजीत से) – हां चाचा जी मैं वही राज पुरोहित हूँ जिसे आपने तल्लीनता से पढ़ने के लिए कहा था।

 

 

अजीत (खुश होते हुए) – आजकल दिखाई नहीं देते हो बेटा।

 

 

राज (अजीत से) – चाचा जी! आजकल मैं भोपाल में रहता हूँ और एक बड़ी कम्पनी में सी. ए. बन गया हूँ।

 

 

अजीत (राज से) – यह सी. ए. क्या है?

 

 

(राज अजीत को सी. ए. के विषय में बताता है)

 

 

अजीत (खुश होकर) – यह तो बहुत ही अच्छा हुआ तुमने अपने गांव का नाम और मान बढ़ाया है।

 

 

राज (अजीत से) – यह सब आपके कारण और शिक्षा का फल है।

 

 

अजीत (चौकते हुए) – मेरे कारण क्या मतलब?

 

 

राज (अजीत से) – चाचा! आपका वह वाक्य ‘तल्लीनता से पढ़ाई करना’ मेरे लिए शिक्षा के मार्ग को सुगम बनाता चला गया। शिक्षा के भरोसे मैं आज सफल हो गया हूँ।

 

 

 

 

 

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